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दीपावली का प्रथम दिवस; भगवान धन्वंतरि और माता लक्ष्मी की पूजा तथा स्वर्ण क्रय का शुभ मुहूर्त।
धनिया-गुड़ (धनिये और गुड़ का नैवेद्य)
मोतीचूर लड्डू (लक्ष्मी-कुबेर पूजा हेतु)
खीर (संध्या का नैवेद्य)धनतेरस कृष्ण पक्ष की वह त्रयोदशी है जिससे दीपावली की पाँच संध्याएँ आरंभ होती हैं। परंपरा इस दिन को इसके लोक-नाम से नहीं, इसकी विधि से पहचानती है। स्कंद पुराण बताता है कि इस त्रयोदशी को रात्रि के आरंभ में घर के बाहर यमराज के लिए रखा गया दीप परिवार से अकाल मृत्यु को दूर रखता है। यह संध्या उन पाँच संध्याओं में से एक है जिनमें द्वादशी से शुक्ल प्रतिपदा तक दीपों से नीराजन होता है। भागवत पुराण बताता है कि देवताओं के वैद्य और आयुर्वेद के प्रवर्तक धन्वंतरि समुद्र-मंथन से अमृत-कलश लिए प्रकट हुए। इस त्रयोदशी को धन्वंतरि का दिन मानना परंपरा है; उसी प्रकार 'धनतेरस' नाम — धन और तेरस (तेरहवीं तिथि) — नए धातु के बर्तन, सोना या चाँदी क्रय करना, और संध्या को कुबेर सहित लक्ष्मी की पूजा भी परंपरा है (परंपरा)।
और पढ़ेंमुहूर्त पर स्मरण, आरती के साथ गायन, कथा का पाठ।